चल पड़ती हैं इनकी दुकानें, जब सजता है चुनावी पंडाल

चुनाव आते ही चारो तरफ एक अलग ही तरह का माहौल देखने को मिलता है। जिन गलियों में कल तक एक इंसान नजर नही आता था। उन गलियों से चुनावो के दौरान नारों की आवाजें सुनाई देती है। इसी से आप अंदाजा लगा सकते हो कि चुनाव का असर  कितना हावी होता है। ऐसे समय में उपर से लेकर नीचे तक सभी महकमों की जेबें भरी-भरी नजर आती हैं और जो लोग कल तक खाली बैठे थे उन लोगों के हाथ काम आ जाता है। यह बात तो सौ टका सही है कि चुनावी दिनों में जिन लोगों की दुकानें बंद होने की कगार पर होती है वो दुकानें फिर से चलने लगती है। ऐसे में फिर चाहे वह एक चाय वाला ही क्यूॅं न हो। वैसे भी चुनावी पंडालों में सबसे ज्यादा तो एक चायवाला ही कमा लेता है बाकि तो दूर की बात। इसके अलावा टैंट वाले, प्रिंटिग प्रेस, रिक्सेवाले, थिएटर आर्टिस्ट, गाड़ी वाले और भी न जाने क्या-क्या। सभी के सभी पैंसे बटोरने में लग जाते हैं और यह तो हक है आखिर उनकी मेहनत की कमाई जो है।

चुनावी माहौल में कुछ चीजें अच्छी तो कुछ चीजें बुरी भी हैं। देखा जाए चुनावों के दौरान जिस तरह से पैसा बहाया जाता है। वह किसी न किसी रूप से आम जनता का ही होता है। जिन्हें नेता लोग जनता के कामों में न लगा अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। अनाप-सनाप के रूपयों से अधिकतर काम बूरे ही होते हैं। चुनावों में ज्यादातर युवा ही जुड़े होते हैं जो इन रूपयों को शराब, नशे जैसे बुरे कामों में लगा देते हैं। बाकि वो भी अपने जेबे भरने में लगे रहते हैं। रूपयों की इतनी बरबादी देख एक बार लगता नही कि हम ऐसे देश में रहते हैं जहाॅं करोड़ों लोगों को गरीब रेखा से नीचे जीवन यापन करते हैं। इन सब में कहीं न कहीं जनता का ही दोष है जो ऐसे नेताओं को चुनती है जो उनकी सेवा नही बल्कि अपनी पेट पूजा में लगा रहता है।

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