“ना जाने कहाँ गया ‘वो दौर’, बस गया है इंसान में अब कोई और” – सैय्यद एहतिशाम रिज़वी

हर समय को एक दौर कहा जाता है। समय बीत जाने के बाद कहा जाता है कि “एक दौर” था जब ऐसा होता था, एक दौर था जब भाई-भाई के लिए जान कुर्बान कर देता था एक दौर था। जब दोस्त-दोस्त के लिए जान दे देता था। उसी तरह आज का दौर है जो आने वाले दौर में काले अक्षरों से लिखा जाएगा क्योंकि इस दौर में हम भूल गए है कि हम एक इंसान है और इसकी वजह हम सब ही है कोई दूसरा नही। आज एक लड़की अपने जीजा के साथ खुद को सहज महसूस नही करती है जब कि यह रिश्ता किसी दौर में भाई-बहन का हुआ करता था लेकिन आज हमारी गन्दी मानसिकता ने इसे कलंकित कर दिया है। आज कोई लड़की अपने चाचा के साथ खुद को सुरक्षित नही पाती है।

किसी दौर में चाचा- भतीजी की रिश्ता बाप-बेटी का रिश्ता हुआ करता था। आज एक महिला अपने किसी रिश्तेदार के साथ सुरक्षित नही है जबकि वो रिश्ते किसी दौर में सुरक्षा का प्रमाण हुआ करते थे। इस दौर में वो सब रिश्ते सिर्फ एक हवसी दरिन्दे बन कर रह गए है। जिस देश मे महिलाओं को पूजा जाता था। आज उसी देश मे महिलाओ को कुचलने का काम आम बात हो गयी है। कोई आदमी कभी जुए में अपनीं पत्नी को हार जाता है तो कोई चंद पैसों के लिए अपने ही समाज की अपनी बेटी जैसी किसी गरीब की बेटी को बाज़ार में बेच देता है। जिसके ज़िम्मेदार हम सब है आज किसी जब सरे बाजार किसी महिला की इज़्ज़त को तार-तार कर दिया जाता है तो उसे हम अपने मोबाइल में वीडियो बनाते है ताकि हम दोस्तो को दिखा कर हंस सके और उसका मजाक बना सकें लेकिन उसकी मदद को आगे नही आते है।

सईद एहतिशाम रिज़वी Hindu - muslim Ekta

किसी दौर में एक भाई की मदद के लिए दूसरा भाई अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा दिया करता था। जब राम को वनवास मिला तब लक्ष्मण ने अपनी मर्ज़ी से अपने भाई के साथ जंगल बसा लिया जबकि वनवास तो सिर्फ राम को मिला था। लक्ष्मण को नही, आज उसी भारत में एक भाई अपने भाई को चंद पैसों के लिए कत्ल कर देता है जो सिर्फ इस दौर में होता है किसी और दौर में नही हुआ। आज के समय में हम धार्मिक नामक बीमारी से ग्रस्ति हो चुके हैं और धर्म के नाम पर ख़ून बहाने के लिए उत्सुक रहते हैं। किसी भी धार्मिक ग्रन्थ में किसी को नुकसान पहुॅंचाने के बारे में नही कहा गया है।

आज के समय में राजनीति का स्तर इतना नीचे गिर चुका है कि उसके लिए इस कलयुग में कोई शब्द बना ही नही है। राजनीति के नाम में इंसानों ने सभी हदों को पार कर दिया है। जिसे हम नाम देते है धार्मिक गुटों की लड़ाई क्या सच मे ये धार्मिक गुटों की लड़ाई होती है किस धर्म मे लिखा है की किसी का घर जला दो जो दिन भर कठिन से कठिन परिश्रम करके रात को एक वक्त की रोटी खा पाते है सबसे ज़्यादा नुकसान इनका ही होता है क्योंकि अमीरों के घर घास फूस के नही बने होते है और उनके घरों में सुरक्षाकर्मी भी तैनात रहते है। जिन्हें देखते ही गोली भी मार देते है। उन महिलाओ को सरे बाजार निर्वस्त्र कर दिया जाता है जो कई दिन पेट काट के अपने शरीर को ढकती हम उनको निर्वस्त्र करने में एक पल नही लगते है क्योंकि ये हमारे पास एक सुनहरे मौके की तरह है जो जिसमे हमारा नाम भी नही आएगा।

हद तो तब होती है जब हम मासूम बच्चों को काट देते है और ज़िंदा जला देते है तो कभीं हवा में उछाल देते है लेकिन पूछो उस माँ से जो तुमको ज़रा से चोट लगने पर पागल हो जाया करती थी। आज उसी मां के सामने तुम उसके बच्चे को किस तरह हैवानियत से मार रहे हो क्योंकि तुम्हारे सिर पर नाश चढ़ा है तुम्हारी आंखों पर पट्टी बंधी है धर्म नामक एक ऐसे वहशी दरिन्दे की जो सबकुछ बर्बाद कर देना चाहता है जिसे आज की आम भाषा मे राजनीति भी कहा जाता है।

अतिथि लेखक- सैय्यद एहतिशाम रिज़वी

2 thoughts on ““ना जाने कहाँ गया ‘वो दौर’, बस गया है इंसान में अब कोई और” – सैय्यद एहतिशाम रिज़वी

  • February 14, 2019 at 3:32 pm
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    Bhai mahabharat me pandav dravpati ko juye me haar gye
    Ye purane daor ki baat h
    Menka ne Indra ko bahka dia Ye b Purana daor tha
    Ravan ne seeta ji ka aaparan kr lia ye b Purana daor tha
    Karbala me log paise pr bike,sharabi b bhot the US Waqt, bani abbas b ghar k hokar dogle nikle
    Aaise bhot se mashale h
    Puri baat ka nichodh Ye h ki
    Achchhai or burai har daur me thi
    Bus insan ki mansikta jaisi hoti h
    Waisa hi wo karaya krta h

    Reply
    • February 15, 2019 at 3:40 am
      Permalink

      लेकिन शायद आप भूल रहे है कि तब उंगली पर गिन सकते थे आज उंगली पर नही गिन सकते है आज हर घर मे वही हाल है
      हर इंसान की वही सोच हो गयी है पड़ोस में देखिये आपको समझ आ जायेगा मेरे भाई

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