निकल चूका है “सुरीलो राजस्थान” का कारवां, कलाकार ही है सिर्फ इसकी मंजिल

राजस्थान के लोक-संगीत की बात ही कुछ निराली है। जितने रंग राजस्थान के पहनावे में हैं उससे भी कई ज्यादा रंग इसके गीत-संगीत में है। जिस वजह से हर कोई राजस्थान के धोरों की ओर खींचा चला आता है फिर चाहे वह राजस्थान के कल्चर के बारे में जानता हो या फिर नही। पर जैसे ही राजस्थानी संगीत कानों पर पड़ता है तो हर किसी के पांव थिरकने लगते हैं। यही राजस्थानी गीतों की खूबी है। अगर राजस्थानी भाषा की बात की जाए तो इसकी उत्पति शौरसेनी गुर्जर अपभ्रंश से मानी जाती है और 17वीं सदी तक आते-आते इसने अपनी अलग पहचान बना ली।  राजस्थान में 72 बोली बोलियाॅं जाती हैं। जिस वजह से यहाॅं राजस्थान के लोक-संगीत में भी कई तरह की विभिन्नताएं पाई जाती है।

Jaipur Explore

अगर आपको राजस्थान के ये लोक संगीत एक ही जगह पर देखने को मिले तो इसके बारे में आपकी क्या राय होगी?  कुछ ऐसा ही है सुरीलो राजस्थान का उद्देश्य जिसके जरिये राजस्थान के कोनो- कोनो से जुड़े कलाकारों को एक मंच पर लाना है। जिससे इस इवेंट को देखने के साथ-साथ कलाकारों को भी एक अलग तरह का माहौल देखने को मिलता है। आपको बता दें की राजस्थान के लोक-गीतों में यहाॅं की आदिवासी जनजातियों का काफी बड़ा योगदान रहा है। अगर बात की जाए राजस्थान के लोकगीतों की तो इसमें खासतौर पर घूमर, गोरबंध, मोरिया, झोरावा, कांगसियों, सुवटिया, लांगुरिया, पावणा, सिठणें, कामण, पीपली, चिरमी, पणिहारी, हरणी जैसे लोक गीत प्रमुख हैं। राजस्थान की गायन शैलियाॅं में लोक गायन शैली, मांगणियार गायन शैली, लंगा गायन शैली, तालबंधी गायन शैली, तालबंधी गायन शैली और हवेली संगीत गायन शैली प्रमुख हैं। इसे देखकर आप अनुमान लगा सकते हो कि राजस्थान के लोक-गीतों में कितनी गहराई है। जिसके बारे में कछ ही लोगों को मालूम है।

Jaipur Explore ने सुरीलो राजस्थान के जरिए इसकी शुरूआत कर दी है। जिससे  सुरीलो राजस्थान के मंच को राजस्थान के सुरमयी गीतों से सजाया जाएगा। जिसके लिए हम अपने पहले चरण के लिए निकले है जैसलमेर  और इससे सटे इलाकों की ओर। इन इलाकों में आपको लोक-कलाकारों की भरमार देखने को मिलेगी। यहाॅं आपको हर उम्र के लोग राग लगाते हुए नजर आएगे और इसी वजह से जैसलमेर विदेशी सैलानियाॅं को काफी रास आता है। इसके अलावा राजस्थान के अन्य शहरों की औऱ धीरे-धीरे बढ़ते रहेंगे।

 

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